
जनपद कौशांबी में पत्रकार इश्तियाक अहमद को जेल भेजे जाने का मामला लगातार चर्चा में बना हुआ है। घटना के तीसरे दिन भी प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट और संतोषजनक स्थिति सामने नहीं आई है। निष्पक्ष जांच के अभाव को लेकर पत्रकार समुदाय और सामाजिक संगठनों में गहरी नाराज़गी व्याप्त है।स्थानीय पत्रकारों का आरोप है कि बिना ठोस एवं पारदर्शी जांच के ही कठोर कार्रवाई की गई। उनका कहना है कि यदि किसी पत्रकार पर आरोप हैं, तो विधिसम्मत और निष्पक्ष जांच के उपरांत ही कोई कदम उठाया जाना चाहिए था। अचानक की गई इस कार्रवाई ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर कई गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किसके दबाव में यह निर्णय लिया गया? क्या संबंधित अधिकारियों ने सभी तथ्यों की समुचित समीक्षा की? या फिर किसी बाहरी प्रभाव में आकर कार्रवाई को अंजाम दिया गया? इन प्रश्नों का उत्तर अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है।पत्रकार संगठनों का कहना है कि लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है, और उसकी स्वतंत्रता एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि मीडिया कर्मियों पर बिना पर्याप्त जांच के कार्रवाई होगी, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चिंताजनक संकेत है।अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस प्रकरण की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाएगी? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा होगी? और सबसे महत्वपूर्ण — क्या इश्तियाक अहमद को न्याय मिलेगा?फिलहाल पत्रकार समाज एवं आमजन सत्य के उजागर होने और न्यायपूर्ण निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।